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Tuesday, June 2, 2020

दिमाग तेज करना चाहते हैं तो सीखें दो भाषायें

एक नए शोध में यह बात सामने आयी है कि दो भाषा (Language) सीखने वालों का दिमाग अन्य की तुलना में अधिक तेज होता है। ऐसा मस्तिष्क के कार्यकारी नियंत्रण क्षेत्र में ग्रे मैटर के अधिक जमाव के कारण होता है।

इससे पहले कहा जाता था कि दो भाषा सीखने से बच्चों में भाषा के विकास में विलम्ब होता है, क्योंकि इसके लिए उन्हें दो शब्दावलियों को विकसित करना पड़ता है। शोध के लिए शोधकर्ताओं ने अमेरिकन साइन लैंग्वेज (ए. एस. एल.) व स्पोकन इंग्लिश के द्विभाषियों तथा एक भाषा के जानकारों के ग्रे मैटर की तुलना की।
जार्जटाउन यूनिवर्सिटी मेडिकल सेण्टर वाशिंगटन, अमेरिका में सेण्टर ऑफ़ लर्निंग के निदेशक ग्विनेवेयर इडेन ने कहा, “एक भाषा बोलने वालों की तुलना में दो भाषाओँ का अनुभव तथा उनका सही तरीके से इस्तेमाल करने के लिए संज्ञानात्मक नियंत्रण की जरूरत में वृद्धि के परिणामस्वरुप दो भाषायें बोलने वालों के मस्तिष्क में कुछ परिवर्तन आते हैं। “शोधकर्ताओं ने दो भाषा तथा एक भाषा बोलने वालों के ग्रे मैटर के मध्य तुलना की। दो भाषा बोलने वालों के मस्तिष्क के फ्रंटल व पैराइटल क्षेत्रों में ज्यादा ग्रे मैटर पाए गए, जो मस्तिष्क के कार्यकारी नियंत्रण में शामिल होते हैं।

Monday, June 1, 2020

Cosmetology

Cosmetology (कॉस्मेटोलॉजी): अगर सीधे शब्दों में कहा जाये तो शरीर को सुन्दर बनाने का विज्ञान कॉस्मेटोलोगी कहलाता है, और जो लोग इस कार्य को अंजाम देते हैं, वे कॉस्मेटोलॉजिस्ट(Cosmetologist) कहलाते हैं। एक कॉस्मेटोलॉजिस्ट आपकी जरुरत के मुताबिक आपके शरीर को सुन्दर और परफेक्ट लुक दे सकता है। आप कॉस्मेटोलॉजी की सहायता से अपने शरीर की कमियों को आकर्षक लुक दे सकते हैं। इसके द्वारा हम बालों का ट्रीटमेंट, चेहरे के दाग- धब्बे, झाइयों आदि सभी प्रकार की प्रॉब्लम का इलाज करा सकते है। 
आज के दौर में युवा अपनी सुंदरता के प्रति अत्यधिक जागरूक हो गए हैं। आज युवा सिर्फ बाल कटवाने के लिए ब्यूटीशियन्स के पास नहीं जाते बल्कि उनकी दूसरी भी आवश्यकताए हैं जिनके लिए वे cosmetologist का सहारा लेते है। यहाँ पर फेसलिफ्टिंग, झाइयों का इलाज, मुहांसों का इलाज़, पूरे शरीर पर कहीं भी पड़े स्ट्रैच और दाग़ धब्बों का इलाज, अनचाहे बालों को हटवाना, बालों की स्टाइलिंग आदि सभी समस्यायें और कार्य  cosmetologist द्वारा किये जाते हैं।

Sunday, May 31, 2020

पत्थर को मोड़कर बना सकते हैं कोई भी आकृति

क्या कोई पत्थर आप अपने हाथ से जोर लगाकर मोड़ सकते हैं। सोचने में थोडा अटपटा जरूर लगेगा, लेकिन ऐसे पत्थर भी होते हैं, इन्हें आप बहुत ही आसानी से मोड़ सकते हैं। इन्हें मोड़कर कोई भी आकृति बना सकते हैं। इनका वजन भी आम पत्थरों की अपेक्षा बहुत ही कम होता है। इसमें हैरानी वाली बात यह है कि जब पत्थरों को काटा जाता है तब जो छोटे टुकड़े बचते हैं, उन्हें आप तह करके रख सकते हैं। ये पत्थर जम्मू के जीजीएम साइंस कॉलेज के म्यूजियम में रखे हैं। यहाँ पर यह पत्थर हरियाणा के झज्जर से लाये गए हैं। साइंस कॉलेज में जियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. सीके खजूरिया का कहना है कि यह पत्थर झरझरे होते हैं। अभ्रक के साथ जुड़े होते हैं। इनका झरझरापन इन्हें मोड़ने में मदद करता है। इन पत्थरों के बीच कुछ मिनरल मौसम के कारण बाहर निकल जाते हैं और उनमें खालीपन आ जाता है। ये पत्थर उद्योग और वास्तुकला में इस्तेमाल होते हैं। जम्मू के इस म्यूजियम में ये पत्थर वर्षों से पड़े हुए हैं। डॉ. खजूरिया ने बताया कि म्यूजियम में आने वाले अधिकांश लोगों को ये पत्थर हैरान करते हैं।

Tuesday, May 26, 2020

What is Air Quality Index?

Air-Quality-Index
  1. इसकी शुरुआत 06 अप्रैल, 2016 को हुई | 
  2. यह सूचकांक आई.आई.टी., कानपुर द्वारा विकसित किया गया है |
  3. यह भारत के शहरी क्षेत्रों में वायु प्रदूषण मापन का एक सूचकांक है |
  4. पर्यावरण सरंक्षण एजेंसी (EPA), वायु गुणवत्ता सूचकांक की गणना पांच प्रमुख वायु प्रदूषकों को विनियमित करने के लिए करती है |
  5. क्लीन एयर एक्ट में ये पांच वायु प्रदूषक है :- 
      • ग्राउंड ओजोन 
      • पार्टिकल पॉल्यूशन (पार्टिकुलेट मैटर) 
      • कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) 
      • सल्फर डाईऑक्साइड (SO2)
      • नाइट्रोज़न डाईऑक्साइड (NO2)
  6. एयर क्वालिटी इंडेक्स 0 से 500 के मापदंड पर चलता है |
  7. ग्राउंड लेवल ओजोन एवं एयरबॉर्न पार्टीकल्स ये दो ऐसे हवा में मिश्रित प्रदूषक है, जो देश में मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा कर रहे हैं |

Sunday, November 6, 2016

इंडियन बोन फिलर जोड़ेगा चूर हो गयी हड्डियों को भी

किसी हादसे में यदि आपकी हड्डी बुरी तरह टूटकर चूर-चूर हो गयी है तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसके इलाज के लिए जिस महंगे विदेशी बोन फिलर का इस्तेमाल किया जाता था, उसके स्थान पर BHU और IIT के विशेषज्ञों ने सस्ता Indian Bone Fillar(इंडियन बोन फिलर) तैयार कर लिया है। बाहर से आने के कारण विदेशी बोन फिलर की कीमत ढाई से तीन हजार रुपये प्रति ग्राम तक होती है, जो काफी महंगा है, जबकि यहाँ बना बोन फिलर विदेशी बोन फिलर के मुकाबले एक चौथाई तक सस्ता होगा। इंडियन बोन फिलर के लिए आई.आई.टी. में करीब 200 सैंपल बनाये गए हैं। इसके पेटेंट के लिए भी आवेदन किया गया है। इसके निर्माण के लिए कुछ कम्पनियां आगे आयी हैं, अगर सब कुछ ठीक रहा तो एक या दो वर्ष में ही इंडियन बोन फिलर इलाज के लिए बाजार में आ जायेगा। भारत सरकार के मेक इंडिया के तहत यह एक बड़ी उपलब्धि होगी।
गड्ढे को भी भरता: किसी हादसे में जब सिर्फ हड्डी ही टूटती है तो उसको स्टील या पोलीमर लगाकर ही जोड़ दिया जाता है, लेकिन जब उसका चूरा हो जाता है तो चोट के स्थान पर गड्ढे भी हो जाते हैं। अगर उसे भरा नहीं जाये तो हड्डी ठीक से जुड़ नहीं पाती है और चोट का स्थान भद्दा सा लगता है। इसी समस्या को हल करने के लिए बोन फिलर की जरूरत पड़ती है। कैल्शियम (Calcium) और बोन मिनरल की सहायता से इसे तैयार किया जाता है | 
जुटे हैं कई विशेषज्ञ: केमिकल इंजीनियरिंग विभाग, आई.आई.टी. के प्रो. प्रदीप कुमार श्रीवास्तव एवं चिकित्सा विज्ञान संस्थान स्थित हड्डी रोग विभाग, बी.एच.यू. के प्रो. अमित रस्तोगी के निर्देशन में टिश्यु इंजीनियरिंग लैब में इंडियन बोन फिलर बनाया जा है। इनके अलावा भी कई विशेषज्ञ जुटे हुए हैं।
जानवरों पर परीक्षण रहा है सफल: बी.एच.यू. के हड्डी रोग विभाग के प्रो. अमित रस्तोगी का कहना है कि बोन फिलर बनाने के लिए काफी दिनों से कार्य चल रहा है। फिलहाल जानवरों पर इसका परीक्षण किया जा रहा है, जो काफी सफल साबित हो रहा है। पेटेंट मिलते ही इसका इंसानों पर परीक्षण शुरू कर दिया जाएगा। इससे खराब से ख़राब टूटी हड्डी को भी जोड़ने में भी सहायता मिलेगी।

Sunday, July 12, 2015

अब इंसान सच में बदलेगा गिरगिट की तरह रंग

वाशिंगटन/एजेंसी: सेन्ट्रल फ्लोरिडा विश्वविद्यालय में भारतीय मूल के वैज्ञानिक देवाशीष चन्दा व उनकी टीम ने मिलकर ऐसी तकनीक बनाई है जिसका उपयोग इंसान के बाल से भी हल्का व महीन डिस्प्ले बनाने में किया जा सकता है। इस तकनीक की मदद से सामान्य कपड़ों का रंग भी बदला जा सकता है और कम बिजली से चलने वाले हल्के ई-स्क्रीन रीडर भी बनाये जा सकते हैं। यह एक ऐसा लचीला डिस्प्ले है जो प्रकाश का कुछ भाग सोख लेता है तथा कुछ भाग परावर्तित कर देता है। डिस्प्ले के लिए जो वोल्टेज चाहिए वह बहुत ही हल्के व इंसान के शरीर के लिये सुरक्षित हैं। एक छोटी सी बैटरी के द्वारा यह प्रक्रिया पूरी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार डिस्प्ले का रंग बदलने की यह क्षमता वोल्टेज में आये उतार-चढ़ाव से हासिल की जाती है। यह तकनीक लाल, हरे और नीले रंग के सम्मिश्रण से पैदा होने वाले सभी रंग बना सकती है। भविष्य में इसका उपयोग सैनिकों को युद्ध में दुश्मन से छिपाने के लिये रंग बदलने वाले कपड़े बनाने में भी किया जा सकेगा।

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